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Corporate NPA: एनपीए के मोर्चे पर मिलने लगी राहत, एक दशक में सबसे कम, बैंकों की रिकवरी भी नरम



<p>देश के विभिन्न वाणिज्यिक बैंकों को पिछली कुछ तिमाही के दौरान एनपीए और रिकवरी के मोर्चे पर बड़ी राहत मिली है. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के लिए बैंकों के जारी परिणाम बताते हैं कि जहां कॉरपोरेट एनपीए का एडिशन धीमा हुआ है, वहीं बैंकों की रिकवरी भी धीरे-धीरे कम होने लग गई है.</p>
<h3>इस तरह से कम हुई है रिकवरी</h3>
<p>ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई को जून 2023 तिमाही में 3,607 करोड़ रुपये की रिकवरी हुई. इससे पहले एसबीआई को जून 2022 तिमाही में 5,208 करोड़ रुपये की और मार्च 2023 तिमाही में 4,200 करोड़ रुपये की रिकवरी हुई थी. इसका मतलब हुआ कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिकवरी साल भर पहले की समान तिमाही से काफी कम रही है. इतना ही नहीं बल्कि एक तिमाही पहले यानी मार्च 2023 तिमाही की तुलना में भी आंकड़ा कम है.</p>
<h3>इन बैंकों के साथ भी दिखा सेम ट्रेंड</h3>
<p>कमोबेश यही ट्रेंड अन्य प्रमुख बैंकों के साथ भी दिखाई देता है, चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट. पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक के साथ भी ऐसा ही हुआ है. इन सभी बैंकों की रिकवरी चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कम हुई है. इससे पता चलता है कि शायद बैंकों की रिकवरी ने पहले ही अपना उच्च स्तर हासिल कर लिया और अब रफ्तार ढलान पर है.</p>
<h3>ऐसे कम हुआ एसबीआई का एनपीए</h3>
<p>एनपीए के आंकड़े को देखें तो एसबीआई के मामले में ग्रॉस आधार पर यह मार्च 2018 में 10.91 फीसदी के उच्च स्तर पर था. अभी जून 2023 तिमाही में कम होकर यह 2.76 फीसदी पर आ गया है, जो पिछले एक दशक में सबसे कम है. एसबीआई के चेयरमैन दिनेश खारा ने बताया था कि जून तिमाही के दौरान 7,659 करोड़ रुपये के नए एनपीए रिकॉर्ड किए गए, उनमें से जून तिमाही में ही 1,500 करोड़ रुपये की रिकवरी हो गई. उन्होंने बताया कि नए एनपीए में एमएसएमई और एग्रीकल्चर सेक्टर का ज्यादा योगदान रहा.</p>
<h3>इस तरह से मिल रही राहत</h3>
<p>इसका मतलब हुआ कि अब बैंकों के एनपीए को बढ़ाने में कॉरपोरेट सेक्टर का योगदान कम हुआ है. अब बैंकों के कर्ज अन्य सेक्टर्स में ज्यादा फंस रहे हैं, जिनमें एमएसएमई और एग्रीकल्चर प्रमुख हैं. वहीं रिकवरी के पीक से उतरने की शुरुआत बताती है कि बैंकों को अब लीगेसी इश्यूज यानी पुराने जमाने से विरासत में मिले बोझ से राहत मिलने लगी है.</p>
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