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हार का डर या पैनी रणनीति: मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में चुनाव से पहले बीजेपी ने क्यों बांटे टिकट?



<p style="text-align: justify;">भारतीय जनता पार्टी ने 17 अगस्त को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की चुनिंदा विधानसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की. यह घोषणा पिछले दिन नई दिल्ली में बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद की गई. छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों में से 21 और मध्य प्रदेश की 230 में से 39 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की गई.</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल ये है कि बीजेपी ने इतनी जल्दी उम्मीदवारों की घोषणा क्यों की है, जबकि दोनों राज्यों में साल के अंत में चुनाव होने हैं? बीजेपी के सूत्रों ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी की कोर रणनीति टीम ने उन सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा करने का फैसला किया जहां पार्टी ने लंबे समय से जीत हासिल नहीं की है, या कांग्रेस के साथ करीबी लड़ाई में है. बीजेपी ने सीटों को चार श्रेणियों (ए, बी, सी और डी) में बांटा है.</p>
<p style="text-align: justify;">ए श्रेणी की सीटों को सुरक्षित माना जाता है जबकि बी में ऐसी सीटें हैं जहां बीजेपी एक बार हारी थी. श्रेणी सी में ऐसी सीटें हैं जहां पार्टी के उम्मीदवार दो बार से ज्यादा हार गए हैं, जबकि डी में वे सीटें शामिल हैं जो कभी नहीं या शायद ही कभी जीती हैं. घोषित किए गए अधिकांश उम्मीदवार सी और डी श्रेणियों की सीटों के लिए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">छत्तीसगढ़ में जिन 21 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की गई थी, उनमें से 10 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित हैं. 21 सीटों में से एक अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है और बाकी 10 सामान्य सीटें हैं. कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में एसटी आरक्षित सीटों पर भारी बहुमत हासिल किया था. छत्तीसगढ़ में कुल 29 एसटी और 10 एससी आरक्षित सीटें हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मध्य प्रदेश में 39 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मध्य प्रदेश में जिन 39 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की गई है, उनमें से आठ अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि 13 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. एमपी में कुल 47 एसटी आरक्षित सीटें और 35 एससी आरक्षित सीटें हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">राज्य में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में से अधिकांश कांग्रेस के पास हैं. उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी करने में बीजेपी ने छत्तीसगढ़ और एमपी के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई है.</p>
<p style="text-align: justify;">छत्तीसगढ़ में जहां पार्टी विपक्ष में है, इसका उद्देश्य कैडर के लिए उम्मीदवारों को प्रचार करने के लिए पर्याप्त समय देना है. वहीं एमपी में जहां बीजेपी सत्ता में है, पार्टी उम्मीदवारों को सरकार में होने का फायदा देने के साथ-साथ किसी भी विरोध या भीतर से तोड़फोड़ पर लगाम लगाने की योजना बना रही है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कमजोर सीटों पर फोकस</strong></p>
<p style="text-align: justify;">छत्तीसगढ़ में घोषित सीटों में पाटन सीट भी शामिल है, जहां से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सांसद हैं. बीजेपी ने दुर्ग के मौजूदा सांसद विजय बघेल को मैदान में उतारा है, जो पहले &nbsp;एक बार भूपेश बघेल को हरा चुके हैं. विजय बघेल और भूपेश बघेल रिश्तेदार हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">मध्य प्रदेश में घोषित कई सीटें ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की हैं, जहां बीजेपी को लगता है कि वह कमजोर स्थिति में है. घोषित उम्मीदवारों में से एक सुमाओली से ऐदल सिंह कंसाना हैं, जो पूर्व कांग्रेस नेता हैं. मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ बीजेपी में शामिल हो गए थे. कंसाना नवंबर 2020 में विधानसभा उपचुनाव हार गए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">मध्य प्रदेश में जारी लिस्ट में 21 आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं. इनमें 13 अनुसूचित जनजाति (एसटी) सीटें और आठ अनुसूचित जाति (एससी) सीटें हैे. इसमें पांच महिला उम्मीदवार भी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 230 सदस्यीय विधानसभा में 114 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी ने 109 सीटें जीती थीं. बीजेपी ने एसटी सीटों पर अपने खराब प्रदर्शन को एक कारण बताया था.</p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस ने कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई थी, लेकिन बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने के बाद वह सत्ता से बाहर हो गई थी. निवर्तमान सदन में बीजेपी के 126 विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 96 विधायक हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सत्ता में लौटने के बाद से बीजेपी ने एसटी और महिलाओं के लिए योजनाओं को लागू करने पर ध्यान केंद्रित किया है, जो कि आगामी चुनावों में गेमचेंजर साबित होगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आपसी कलह और वोटरों को उबाऊपन को दूर करने पर काम</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए मध्य प्रदेश बीजेपी के एक पदाधिकारी ने बताया- हम कुछ चुनौतीपूर्ण सीटों पर हारने के बाद से अपने कार्यकर्ताओं को जुटाने की दिशा में काम कर रहे हैं. हमने उम्मीदवारों की घोषणा जल्दी कर दी क्योंकि इन सीटों पर कई उम्मीदवार उभर कर सामने आ रहे हैं… हमने स्पष्टता के लिए और अंदरूनी कलह को रोकने के लिए लिस्ट की घोषणा की. सीटों के लिए इस लड़ाई को जल्द ही निपटा लिया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">मध्य प्रदेश में बीजेपी विभिन्न गुटों के बीच अंदरूनी कलह से जूझ रही है. इससे पार्टी के प्रचार अभियान में गृह मंत्री अमित शाह की सीधी भागीदारी हो रही है. पार्टी शिवराज सिंह चौहान के लंबे कार्यकाल के कारण पैदा हुए ‘थकान फैक्टर’ से भी जूझ रही है. चौहान 2003 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे.</p>
<p style="text-align: justify;">बीजेपी की लिस्ट में कुछ पूर्व विधायक शामिल हैं जो पिछला चुनाव हार गए थे या तब उन्हें मैदान में नहीं उतारा गया था. इनमें गोहद से पार्टी के अनुसूचित जाति (एससी) मोर्चा के प्रमुख लाल सिंह आर्य शामिल हैं; पार्टी की प्रदेश उपाध्यक्ष ललिता यादव छतरपुर से चुनाव लड़ रही हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">राऊ से मधु वर्मा; पेटलावद से निर्मला भूरिया; कसरावद से आत्माराम पटेल; पथरिया से लखन पटेल; गुन्नौर से राजेश वर्मा; चित्रकूट से सुरेंद्र सिंह गहरवार; शाहपुरा से ओमप्रकाश धुर्वे; सौंसर से नानाभाऊ मोहोद; महेश्वर से राजकुमार मेव; सुमावली से अदल सिंह कंसाना हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हारे हुए प्रत्याशियों को भी बनाया गया उम्मीदवार</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बता दें कि आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देने वाले राजकुमार कररहे को लांजी निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया गया है. सवाल ये है कि हारे हुए प्रत्याशी को मैदान में क्यों उतारा जा रहा है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">इस सवाल पर मध्य प्रदेश बीजेपी के सचिव रजनीश अग्रवाल कहते हैं- "हमें किसी राजनेता को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ना चाहिए कि वह चुनाव हार गया, नहीं तो राजनीति में कई शीर्ष नेता मौजूद नहीं होंगे. हार जीत कोई मुद्दा नहीं है. अग्रवाल ने कहा कि उम्मीदवारों का चयन कार्यकर्ताओं की भावनाओं, मतदाताओं की उम्मीदों और जीत की संभावना को ध्यान में रखते हुए किया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा ने इंडियन एक्सप्रेस&nbsp; को बताया, ”केंद्रीय चुनाव समिति द्वारा इन 39 उम्मीदवारों का चयन विधानसभा चुनावों के लिए युवा, अनुभवी और महिला उम्मीदवारों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए किया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने कहा, ”चुनाव प्रबंधन, समर्पित कार्यकर्ताओं द्वारा संचालित संगठन और प्रधानमंत्री <a title="नरेंद्र मोदी" href="https://www.abplive.com/topic/narendra-modi" data-type="interlinkingkeywords">नरेंद्र मोदी</a> और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में है. जो गरीबों के कल्याण के लिए योजनाओं को लागू कर रहे हैं और उनके जीवन को बदलने का काम कर रहे हैं. हमें यकीन है ये कदम पार्टी&nbsp; को भारी बहुमत हासिल कराएगा.&nbsp;</p>
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